अगरिया जनजाति
परिचय:
अगरिया जनजाति उत्तर प्रदेश की एक पारंपरिक अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe)है, जो मुख्य रूप से सोनभद्र ज़िले में पाई जाती है। यह जनजाति भारत की उन कुछ जनजातियों में से है, जिनकी पारंपरिक पहचान लोहा गलाने और लोहे के औज़ार बनाने से जुड़ी रही है। अगरिया जन समुदाय के लोग ऐतिहासिक रूप से कच्चे लौह अयस्क से लोहे का निर्माण करने में कुशल माने जाते थे।
मुख्य विशेषताएँ:
| विषय | विवरण |
|---|---|
| निवास क्षेत्र | उत्तर प्रदेश: मुख्यतः सोनभद्र, सीमावर्ती मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ |
| भाषा | हिंदी, गोंडी, भोजपुरी |
| धर्म | हिंदू धर्म के साथ-साथ आदिवासी देवी-देवताओं की पूजा |
| पारंपरिक पेशा | लोहा गलाना, कृषि, मजदूरी, वनोपज संग्रह |
| सम्बंधित जातियाँ | गोंड जनजातियों से सांस्कृतिक जुड़ाव |
पारंपरिक पेशा – लोहा गलाना:
- अगरिया शब्द की उत्पत्ति “अग्नि” से मानी जाती है, क्योंकि यह जनजाति अग्नि (भट्ठी)का प्रयोग करके लोहा निकालती थी।
- पहले ये लोग जंगलों से लौह अयस्क (iron ore) एकत्र कर परंपरागत भट्टियों में गलाते थे।
- इससे कृषि उपकरण, हथियार और औज़ार बनते थे – पर अब यह कला लगभग लुप्त हो चुकी है।
संस्कृति और परंपराएँ:
- अगरिया समुदाय के लोग लोकगीतों और पारंपरिक नृत्यों में रुचि रखते हैं।
- मुख्य त्योहारों में करमा, सरहुल, दिवाली, होली प्रमुख हैं।
- पारंपरिक पोशाकों और गहनों में आदिवासी पहचान झलकती है।
- सामाजिक रूप से ये लोग ग्राम सभा में सामूहिक निर्णय प्रणाली अपनाते हैं।
विशेष तथ्य:
- अगरिया जनजाति की लोहा गलाने की परंपरा को भारत के लोक विज्ञान और धातु शिल्प के इतिहास में विशेष स्थान प्राप्त है।
- मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अगरिया को PVTG (Particularly Vulnerable Tribal Group)का दर्जा प्राप्त है, जबकि उत्तर प्रदेश में ये ST के रूप में मान्य हैं।
- आजीविका संकट के कारण कई अगरिया परिवार मजदूरी या पलायन पर निर्भर हो चुके हैं।





